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निर्यात मिशन — MSME को नई ताकत, 45,000 करोड़ रुपये के सपोर्ट पैकेज से वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की तैयारी

निर्यात मिशन — MSME को नई ताकत, 45,000 करोड़ रुपये के सपोर्ट पैकेज से वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की तैयारी

निर्यात मिशन — MSME को नई ताकत, 45,000 करोड़ रुपये के सपोर्ट पैकेज से वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की तैयारी

भारत सरकार ने निर्यात बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को नई गति देने के लिए एक महत्वाकांक्षी आर्थिक पैकेज और दीर्घकालिक रणनीति को मंजूरी दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन (EPM) को हरी झंडी दी गई, जिसके तहत वित्त वर्ष 2025-26 से लेकर 2030-31 तक कुल 25,060 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। यह मिशन भारतीय उद्योगों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बेहतर स्थान दिलाने, निर्यात प्रक्रियाओं को सरल और डिजिटल बनाने, गुणवत्ता सुधार तथा लॉजिस्टिक्स के आधुनिकीकरण के माध्यम से भारत को “नई निर्यात शक्ति” में बदलने पर केंद्रित है। सरकार का मानना है कि इस मिशन से न केवल निर्यात के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि और रोजगार क्षमता में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।

इसी बैठक में केंद्र ने एक और बड़ा कदम उठाते हुए कर्ज-गैरंटी योजना (Credit Guarantee Scheme for Exporters – CGSE) को मंजूरी दी, जिसके तहत निर्यातकों और MSME क्षेत्र को लगभग 20,000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त ऋण आसान शर्तों पर उपलब्ध कराया जाएगा। यह कदम उन लाखों MSME इकाइयों को राहत देने का प्रयास है, जो पूंजी की कमी, महंगे बैंक ऋण और जोखिम-भारित क्रेडिट नॉर्म्स के कारण अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में अक्षम रही थीं। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह योजना भारतीय MSME को तकनीकी उन्नयन, उत्पादन विस्तार और वैश्विक ऑर्डरों को पूरा करने की दिशा में नई ताकत देगी। इसके साथ ही यह भारत को उन देशों की श्रेणी में सम्मिलित करने की तैयारी है जो अपने निर्यात ढांचे को टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा उपलब्ध कराते हैं।

इन नीतिगत कदमों का एक बड़ा संदर्भ वैश्विक व्यापारिक अस्थिरता और अमेरिका-यूरोप की टैरिफ नीतियों में हालिया बदलाव है। भारतीय कपड़ा, आभूषण, SEZ आधारित उत्पादन, सी-फूड और अन्य श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्रों में पिछले महीनों में मार्जिन बेहद पतले हुए हैं, जिससे रोजगार और उत्पादन दोनों पर दबाव बढ़ा है। उद्योग जगत लंबे समय से यह संकेत दे रहा था कि यदि सरकार विशेष वित्तीय सुरक्षा कवच नहीं प्रदान करती तो भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकता है। ऐसे में एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन और CGSE योजना को “रणनीतिक हस्तक्षेप” के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य भारत की निर्यात क्षमता को स्थिर और मजबूत आधार देना है।

सरकार का दावा है कि यह संयुक्त पैकेज—लगभग 45,000 करोड़ रुपये का—आने वाले वर्षों में न केवल निर्यात वृद्धि को गति देगा, बल्कि लाखों रोजगारों को भी स्थिरता प्रदान करेगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि इन योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावी ढंग से हुआ, तो भारत 2030 तक विश्व के शीर्ष निर्यातकों में शामिल हो सकता है।

2 रुपये किलो प्याज — मोदी सरकार के दावे धरे रह गए, मध्य प्रदेश के किसान बर्बादी के कगार पर

2 रुपये किलो प्याज — मोदी सरकार के दावे धरे रह गए, मध्य प्रदेश के किसान बर्बादी के कगार पर

2 रुपये किलो प्याज — मोदी सरकार के दावे धरे रह गए, मध्य प्रदेश के किसान बर्बादी के कगार पर

मध्य प्रदेश के प्याज उत्पादक किसान इन दिनों खून के आंसू रो रहे हैं। राज्य के कई जिलों — नीमच, मंदसौर, उज्जैन, रतलाम और शाजापुर — की मंडियों में प्याज की कीमत सिर्फ 2 रुपये प्रति किलो तक गिर गई है। किसानों की हालत यह है कि वे अपनी मेहनत की उपज औने-पौने दामों में बेचने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके पास न तो भंडारण की सुविधा है, न ही इंतज़ार की गुंजाइश। धूप में झुलसते, बारिश में भीगते और कर्ज के बोझ तले दबे किसान अब अपने प्याज की उपज को ट्रैक्टरों से मंडियों तक लेकर जा रहे हैं — लेकिन लौटते वक्त उनके हाथों में सिर्फ निराशा और आंखों में आंसू हैं।
मंडी के बाहर पड़े प्याज के ढेर किसानों की बेबसी का प्रतीक बन चुके हैं। 2 रुपये किलो के भाव में प्याज बेचना मतलब किसान की सालभर की मेहनत और लागत का अपमान। खेत जोतने, बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, ट्रांसपोर्ट और मंडी शुल्क — इन सब खर्चों के बाद प्याज की लागत करीब 8 से 10 रुपये प्रति किलो पड़ती है। लेकिन बाजार में उन्हें उसका पांचवां हिस्सा भी नहीं मिल पा रहा। कई किसान तो मजबूर होकर अपनी उपज सड़कों पर फेंक रहे हैं, क्योंकि प्याज बेचने से बेहतर है उसे मिट्टी में मिलाना — कम से कम ट्रांसपोर्ट का खर्च तो बचेगा।

किसानों की यह हालत ऐसे समय में हो रही है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में वादा किया था कि “2022 तक किसानों की आय दोगुनी की जाएगी।” लेकिन 2025 तक पहुंचते-पहुंचते वास्तविकता यह है कि किसान की आय बढ़ने की बजाय घट गई है। केंद्र सरकार की योजनाएं, घोषणाएं और भाषण कागज़ों पर भले सुनहरे लगते हों, पर जमीन पर किसान की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। प्याज, टमाटर, लहसुन, आलू — हर फसल के दाम औंधे मुंह गिर रहे हैं, और कृषि नीति अब किसान के पक्ष में नहीं बल्कि बाज़ार और बिचौलियों के लिए ज्यादा लाभकारी दिखती है।

प्याज किसानों का कहना है कि अगर सरकार वास्तव में किसानहितैषी होती, तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागू करती और बाजार में बिचौलियों पर रोक लगाती। लेकिन सरकार ने न तो प्याज को MSP के दायरे में शामिल किया, न ही मूल्य स्थिरीकरण फंड का उपयोग किसानों के लिए किया। परिणामस्वरूप आज प्याज किसान या तो कर्ज़ में डूब रहे हैं या आत्महत्या के कगार पर पहुंच चुके हैं।

विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस प्रवक्ताओं ने कहा कि “प्रधानमंत्री किसानों की आय दोगुनी करने का वादा करके आए थे, लेकिन हकीकत यह है कि उन्होंने किसानों को पूरी तरह बर्बाद कर छोड़ा है।” पार्टी ने सरकार से तत्काल राहत पैकेज और प्याज किसानों के लिए समर्थन मूल्य तय करने की मांग की है।

राजनीतिक विश्लेषक इसे चुनावी वादों और जमीनी सच्चाई के बीच की खाई का सबसे बड़ा उदाहरण मान रहे हैं। किसानों की नाराज़गी अब धीरे-धीरे सड़कों पर उतरने लगी है। गाँवों से शहरों तक “किसान के आंसू, सरकार की चुप्पी” जैसे नारे सुनाई दे रहे हैं। यदि हालात ऐसे ही बने रहे, तो यह केवल प्याज का संकट नहीं रहेगा — बल्कि भारत के किसान के धैर्य का अंत बन सकता है।


50,000 करोड़ गायब… और सरकार की ‘जबरदस्त’ रिकवरी —ढोल नगाड़े के साथ : बस 3,000 करोड़

50,000 करोड़ गायब… और सरकार की ‘जबरदस्त’ रिकवरी —ढोल नगाड़े के साथ : बस 3,000 करोड़

50,000 करोड़ गायब… और सरकार की ‘जबरदस्त’ रिकवरी —ढोल नगाड़े के साथ : बस 3,000 करोड़

भारत में आर्थिक अपराधों के खिलाफ कार्रवाई का खेल अब इतना पुराना हो चुका है कि जनता को उसकी स्क्रिप्ट पहले से याद है। यह स्क्रिप्ट कुछ यूँ चलती है — पहले सरकार अपने पसंदीदा उद्योगपतियों को कर्ज, टैक्स लाभ, रियायतें और “इकोनॉमिक पैकेज” का पहाड़ सौंपती है; फिर यह उद्योगपति बिना हिसाब-किताब के घाटे में डूबने का नाटक करते हैं; और अंत में सरकार नाटकीय प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जनता को बताती है कि उसने अपराधियों को पकड़ लिया है — भले ही पकड़ती सिर्फ जेब में रखी छुट्टियाँ! यही कहानी अनिल अंबानी जैसी हस्ती पर लागू होती है, जिन पर लगभग 50,000 करोड़ रुपये बकाया हैं — वह भी जनता की जेब से निकला हुआ पैसा। फिर भी सरकार ने जो कार्रवाई दिखाई, वह सिर्फ 3,000 करोड़ की संपत्ति जब्ती के रूप में आई। अब इसे अगर “सख्त कार्रवाई” कहा जाए, तो आम आदमी को क्या कहने दिया जाए? शायद सरकार सोचती है कि जनता बेवकूफ है — न आँकड़ा पूछेगी, न सवाल उठाएगी, बस टीवी पर चलती सुर्खियाँ देखकर खुश हो जाएगी। यह घटना हमें बताती है कि भारत में कानून की तलवार गरीबों पर धारदार और अमीरों पर बोथरी होती है।

और यह सब संयोग नहीं है, यह सत्ता और उद्योग के गठजोड़ की योजनाबद्ध व्यवस्था है। कोई आम आदमी बैंक से 5 लाख का कर्ज ले और किसी मजबूरी में न चुका पाए तो बैंक उसके घर की छत, बच्चों की किताबें, बुजुर्गों के बिस्तर तक ले जाने लगता है। लेकिन बड़े नामों के पास विकल्प होते हैं — विदेश भाग जाओ, दिवालिया घोषित हो जाओ, निजी जेट में उड़ो, यॉट पर पार्टियाँ करो और अंत में शान से कह दो कि “हाथ ख़ाली हैं!” यह कैसा न्याय है जहाँ उस देश में रहने वाले गरीब टैक्स देते-देते थक जाते हैं, लेकिन देश की संपत्ति ख़ुद को “धनकुबर” कहने वालों की जेब में जाती रहती है? यह कैसा सिस्टम है जिसमें सफलता का पैमाना मेहनत नहीं, सत्ता से नज़दीकी है? ऐसा लगता है मानो भारत में एक नया संविधान लिखा जा चुका है:

“धन से बड़ा धर्म है — और दोस्ती उससे भी बड़ा।”

यहाँ सबसे रोचक और खतरनाक पहलू है हेडलाइन मैनेजमेंट — जहाँ सरकार असल काम कम और प्रचार ज़्यादा करती है। जैसे ही संसद में विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी करता है, अचानक ED और CBI के “शेर” दहाड़ने लगते हैं, प्रेस नोट जारी होते हैं और टीवी पर प्राइम टाइम की चीख पुकार शुरू। जबकि आँकड़ों का सच यह बताता है कि बड़े आर्थिक अपराधों पर सरकार की पकड़ सिर्फ मीडिया के फ्रेम में टंगी तस्वीर है, हकीकत में हवा। आज जनता पूछती है — “क्या ED और CBI की दहाड़ सिर्फ सत्ता के दुश्मनों के लिए आरक्षित है?” क्योंकि सरकार के दो सेट हैं:

एक सेट उनके लिए जो विपक्ष में हैं — जिन पर कार्रवाई का भूकंप आता है
दूसरा सेट उनके लिए जो सत्ता के दोस्त हैं — जिन पर सिर्फ हवा चलती है

48 घंटे में टिकट कैंसिल फ्री — DGCA का बड़ा फैसला

48 घंटे में टिकट कैंसिल फ्री — DGCA का बड़ा फैसला

48 घंटे में टिकट कैंसिल फ्री — DGCA का बड़ा फैसला

हवाई सफर करने वाले यात्रियों के लिए एक बेहद सुखद खबर आई है। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) ने फ्लाइट टिकट बुकिंग और कैंसिलेशन नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए एक अहम फैसला लिया है। अब अगर कोई यात्री टिकट बुक करने के 48 घंटे के भीतर कैंसिल करता है या उसमें बदलाव करता है, तो एयरलाइंस किसी भी तरह का अतिरिक्त शुल्क नहीं ले सकेंगी। यह कदम उन हजारों यात्रियों को बड़ी राहत देने वाला है, जिन्हें अचानक प्लान बदलने पर भारी-भरकम कैंसिलेशन फीस की मार झेलनी पड़ती थी। नए नियमों से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों तरह की यात्राओं पर असर पड़ेगा और यात्रियों के अधिकारों को और मजबूत बनाया जाएगा।

DGCA के अनुसार यह निर्णय यात्रियों की लगातार बढ़ती शिकायतों को देखते हुए लिया गया है। अब तक की व्यवस्था में ऐसा होता था कि टिकट बुक करने के कुछ ही घंटों के भीतर बदलाव या कैंसिल करने पर भी एयरलाइंस मनमाने चार्ज वसूल लेती थीं, जिससे यात्रियों को काफी नुकसान उठाना पड़ता था। खासकर तत्काल यात्रा की बुकिंग में, टिकट के साथ भावनाएँ भी फंस जाती थीं। लेकिन नए नियम लागू होने के बाद एयरलाइंस यात्रियों को अधिक पारदर्शिता और लचीलापन उपलब्ध कराएंगी। इस बदलाव का मकसद यात्रियों के पैसे की सुरक्षा और एयरलाइंस की जवाबदेही बढ़ाना है।

DGCA ने हवाई सेवा प्रदाताओं को यह भी निर्देश दिया है कि यात्रियों को रिफंड समय पर मिले और किसी भी बहाने या देरी के लिए एयरलाइंस जिम्मेदार होंगी। कई मामलों में देखने को मिलता था कि यात्रा कैंसिल होने के बाद भी ग्राहकों को महीनों तक रिफंड नहीं मिलता था या उन्हें “क्रेडिट शेल” की मजबूरी थमा दी जाती थी। लेकिन अब नए प्रावधानों के तहत एयरलाइंस को तेजी से रिफंड जारी करना होगा और वह भी पारदर्शी तरीकों से। इससे टिकट बुक करने वालों को आर्थिक तनाव कम होगा और भरोसा बढ़ेगा।

विमानन विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उड़ान सेवाओं की गुणवत्ता में भी सुधार होगा। यात्रियों की संतुष्टि बढ़ेगी तो प्रतिस्पर्धा भी सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ेगी। हालांकि, एयरलाइंस ऑपरेशनल लागत और राजस्व पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर थोड़ी चिंतित हैं, लेकिन यात्रा उद्योग के जानकार इसे लंबी अवधि में विकास को बढ़ावा देने वाला निर्णय मानते हैं। इससे न केवल यात्रियों का अनुभव बेहतर होगा, बल्कि भारतीय एविएशन सेक्टर की साख भी मजबूत होगी।

नए नियम ऐसे समय में आए हैं जब घरेलू हवाई यात्राओं में लगातार तेजी देखी जा रही है। त्योहारों, वेकेशनों और बिजनेस ट्रिप्स में बढ़ोतरी के कारण एयर ट्रैफिक रिकॉर्ड स्तर पर है। ऐसे में यात्रियों को सुविधाजनक और उपभोक्ता-हितैषी प्रावधान देना सरकार की प्राथमिकता बन गई है।

इस महत्वपूर्ण कदम के बाद यह साफ हो गया है कि अब हवाई सफर सिर्फ आसमान की दूरी तय करने का नाम नहीं, बल्कि यात्रियों की सहजता और सुरक्षा को प्राथमिकता देने वाला एक संवेदनशील अनुभव भी बनता जा रहा है। DGCA के इस फैसले से भरोसे की उड़ान को नए पंख मिले हैं — और हवाई यात्रियों को यह कहने का मौका भी “अब टिकट कैंसिल करने से पहले जेब की चिंता नहीं होगी!”

आंध्र प्रदेश ने अगले एक दशक में $1 लाख करोड़ के निवेश का रखा लक्ष्य, नायडू ने किया पेश रोडमैप

आंध्र प्रदेश ने अगले एक दशक में $1 लाख करोड़ के निवेश का रखा लक्ष्य, नायडू ने किया पेश रोडमैप

आंध्र प्रदेश ने अगले एक दशक में $1 लाख करोड़ के निवेश का रखा लक्ष्य, नायडू ने किया पेश रोडमैप

आंध्र प्रदेश सरकार का लक्ष्य अगले एक दशक में एक लाख करोड़ डॉलर निवेश जुटाने का है। इसमें कंपनियों के लिए रकम जुटाने में लालफीताशाही खत्म करने वास्ते एस्क्रो खाता जैसे कदम भी शामिल हैं। राज्य सरकार ने शुक्रवार को यह कहा है।

विशाखापत्तनम में आयोजित 30वें सीआईआई साझेदारी सम्मेलन में सरकार ने कहा कि राज्य के नवाचार प्रयासों में दो वर्षों में भारत की पहली ड्रोन टैक्सी पेश करने की योजना शामिल है।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि आंध्र प्रदेश निवेशकों के वास्ते एस्क्रो खासा प्रणाली पेश करना वाला पहला राज्य बनेगा। उन्होंने कहा, ‘आपके समझौता करते ही एस्क्रो खाता खुद से बन जाएगा और बैंक के जरिये उसी वक्त रकम जारी कर दी जाएगी। आपको किसी अधिकारी या निवेशक से संपर्क करने की जरूरत नहीं होगी। जरूरत पड़ने पर हम सॉवरिन गारंटी देने के लिए भी तैयार हैं।’

आंध्र यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में आयोजित 72 देशों के सम्मेलन के प्रतिनिधियों से नायडू ने कहा कि भारत की पहली ड्रोन टैक्सी अगले दो वर्षों में आंध्र प्रदेश में पेश की जाएगी। परियोजना का विवरण अभी स्पष्ट नहीं है।

पिछले 18 महीनों में आंध्र प्रदेश को 20 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धताएं मिली हैं, जिनसे 20 लाख रोजगार के अवसर पैदा होंगे। उन्होंने कहा कि नया लक्ष्य तीन वर्षों में 500 अरब डॉलर के निवेश का है जिससे 50 लाख रोजगार पैदा होंगे और अगले दशक में 1 लाख करोड़ डॉलर के निवेश का बड़ा विजन है।

राज्य को आगामी डेटा केंद्रों को ऊर्जा प्रदान करने के लिए अधिक हरित ऊर्जा की आवश्यकता होगी। नायडू ने कहा, ‘अब डीप टेक डेटा केंद्र आ रहे हैं। गूगल ने 15 अरब डॉलर (विशाखापत्तनम में एआई केंद्र) की घोषणा की है। इन दो दिनों में, 4 से 5 गीगावॉट के और डेटा केंद्र आने वाले हैं। 1 गीगावॉट डेटा केंद्र के लिए हमें 6 गीगावॉट बिजली और हरित ऊर्जा की आवश्यकता है। इसका कई गुना प्रभाव होगा।’

नायडू ने वैश्विक कंपनियों से सम्मेलन से जाने से पहले समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया और उन्हें राज्य के निर्बाध कार्यान्वयन के ट्रैक रिकॉर्ड का आश्वासन दिया। नायडू ने कहा, ‘एमओयू के बाद आपको हमें याद दिलाने की जरूरत नहीं होगी, हमारी टीम आगे भी काम करती रहेगी। यही हमारी विश्वसनीयता है। आंध्र प्रदेश में निवेश करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एमओयू के माध्यम से सब कुछ तुरंत हो जाएगा। हम तकनीक और कृषि, सड़कें, बंदरगाह, हवाई अड्डे सहित सभी चीजों को एकीकृत करना चाहते हैं।’ नायडू ने बताया कि कैसे विभिन्न कार्यकालों में मुख्यमंत्री के रूप में उनकी सरकार ने हैदराबाद में हाई-टेक सिटी पर ध्यान केंद्रित किया और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र को बढ़ावा दिया। उन्होंने कहा, ‘आज मैं कह सकता हूँ कि भारतीय आईटी क्षेत्र में छा रहे हैं। दुनिया भर में हर चौथा आईटी पेशेवर भारत से है और इन चार में से एक आंध्र प्रदेश से है।’

2025 में 7% की रफ्तार से बढ़ेगी भारत की GDP, मूडीज ने जताया अनुमान

2025 में 7% की रफ्तार से बढ़ेगी भारत की GDP, मूडीज ने जताया अनुमान

2025 में 7% की रफ्तार से बढ़ेगी भारत की GDP, मूडीज ने जताया अनुमान

भारत की अर्थव्यवस्था 2025 में 7 फीसदी और 2026 में 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। रेटिंग एजेंसी मूडीज रेटिंग्स ने यह अनुमान लगाया है। एजेंसी ने अपनी ‘ग्लोबल मैक्रो आउटलुक’ रिपोर्ट में कहा कि देश की वृद्धि को मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और ठोस उपभोग का समर्थन मिल रहा है। हालांकि, निजी क्षेत्र अभी भी पूंजीगत निवेश को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए है।

रेटिंग एजेंसी ने कहा कि उसे उम्मीद है कि भारत जी-20 देशों के सदस्यों में से सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना रहेगा। यह 2027 तक 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़ेगा जिसे घरेलू व निर्यात विविधीकरण का समर्थन प्राप्त मिलेगा। कैलेंडर वर्ष 2025 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर सात प्रतिशत रहने का अनुमान है जो 2024 के 6.7 प्रतिशत से अधिक है।

वास्तविक जीडीपी, आधार वर्ष 2011-12 पर आधारित होती है। कुछ उत्पादों पर 50 प्रतिशत अमेरिकी शुल्क का सामना कर रहे भारतीय निर्यातकों ने निर्यात को पुनर्निर्देशित करने में सफलता हासिल की है। सितंबर में उनका कुल निर्यात 6.75 प्रतिशत बढ़ा, जबकि अमेरिका को निर्यात में 11.9 प्रतिशत की गिरावट आई।

मूडीज ने कहा, ‘‘ हमें उम्मीद है कि 2026 और 2027 में इसकी अर्थव्यवस्था 6.5 प्रतिशत के आसपास बढ़ती रहेगी जिसे कम मुद्रास्फीति के बीच तटस्थ-से-उदार मौद्रिक नीति रुख का समर्थन प्राप्त होगा।’’

चीन के लिए मूडीज ने अनुमान लगाया है कि 2025 उसकी में अर्थव्यवस्था पांच प्रतिशत बढ़ेगी जिसे सरकारी प्रोत्साहन और मजबूत निर्यात का समर्थन प्राप्त होगा। 2027 तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि धीरे-धीरे घटकर 4.2 प्रतिशत हो सकती है।

रेटिंग एजेंसी ने कहा, ‘‘ “वैश्विक स्तर पर जीडीपी की वृद्धि दर 2026 और 2027 में 2.5 एवं 2.6 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान है जो 2025 के 2.6 प्रतिशत और 2024 के 2.9 प्रतिशत से कम है।’’

Apple का 20 हजार रुपये वाला “पॉकेट” प्रोडक्ट — यूजर्स बोले: “एआई बना रही थीं बाकी कंपनियाँ, Apple मोजें बेच रही है

टेक-इंडस्ट्री में जब एक नया लॉन्च आता है, तो उम्मीद भी बड़ी होती है — लेकिन इस बार Apple ने कुछ ऐसा पेश किया है कि सोशल मीडिया पर हंगामा मच गया। Apple ने अपने नए एक्सेसरी प्रोडक्ट ISSEY MIYAKE के साथ मिलकर लॉन्च किया है, जिसका नाम है “iPhone Pocket”, और इसका उद्देश्य शायद है iPhone के लिए एक स्टाइलिश “पॉकेट” देना — लेकिन कीमत और कॉन्सेप्ट ने यूजर्स को हैरान कर दिया।

क्या है यह प्रोडक्ट?

Apple के मुताबिक, iPhone Pocket एक ३-डी निटेड फैब्रिक से बना एक्सेसरी है जिसमें “एक अतिरिक्त पॉकेट” का आइडिया है — आप इसे हँडहेल्ड, बैग पर टाई या पहनकर भी प्रयोग कर सकते हैं। यह iPhone के साथ अन्य छोटे सामान जैसे कार्ड्स या की-चेन आदि भी रख सकता है, और इसे Apple + ISSEY MIYAKE के डिज़ाइन फ्यूज़न में पेश किया गया है।

कीमत क्या है?

भारत में अनुमानित कीमत लगभग ₹20,000 के आसपास है (दूसरी संस्करणों की कीमतें ~₹13,000 से शुरू होती हैं)। विदेशों में इस कीमत को डॉलर में $229.95 बताया गया है।

सोशल मीडिया में प्रतिक्रिया कैसी रही?

ट्विटर, X और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर Apple के इस ‘iPhone Pocket’ प्रोडक्ट को देखकर यूजर्स भड़क उठे और इसे लेकर जबरदस्त मज़ाक उड़ाया जा रहा है। लोगों का कहना है कि जब दुनिया की टेक कंपनियां AI मॉडल और अगली पीढ़ी की तकनीक तैयार कर रही हैं, तब Apple मोज़ों जैसे प्रोडक्ट बेचने में लगा हुआ है। एक यूज़र ने लिखा— “जब बाकी टेक कंपनियां AI बना रही हैं, Apple मोजे बेच रहा है… आखिर हो क्या रहा है?” वहीं मशहूर टेक व्लॉगर MKBHD यानी Marques Brownlee ने तंज कसते हुए कहा— “230 डॉलर का यह पॉकेट असल में यह जांचने का टेस्ट है कि कौन लोग Apple के नाम पर कुछ भी खरीद लेंगे या उसका बचाव करेंगे।”

सोशल मीडिया में इसे ‘मेरे पास iPhone है, लेकिन इसके लिए एक पॉकेट खरीदना?’ जैसे मजेदार मीम्स का विषय बना दिया गया है। कुछ यूज़र्स ने इसे “सॉक्स” या “मोजे” जैसा दिखने वाला एक्सेसरी करार दिया।

यूरिया संकट गहराया — मांग आसमान पर, उत्पादन पीछे, सरकार की बढ़ी चिंता

देश में खेती-किसानी का मौसम अपने चरम पर है, लेकिन इसी बीच एक चिंताजनक तस्वीर उभरकर सामने आई है — भारत में यूरिया की मांग तेज़ी से बढ़ रही है, जबकि घरेलू उत्पादन उसकी रफ्तार पकड़ नहीं पा रहा है। यह असंतुलन अब खाद क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती बन गया है और सरकार को आयात बढ़ाने के सिवा कोई विकल्प नहीं दिख रहा। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर यही स्थिति जारी रही तो आने वाले महीनों में न केवल किसानों को यूरिया की कमी झेलनी पड़ेगी, बल्कि देश का कृषि बजट भी भारी दबाव में आ सकता है।

भारत में हर साल लगभग 3.4 करोड़ टन यूरिया की ज़रूरत होती है, जबकि देश की उत्पादन क्षमता केवल 2.6 करोड़ टन के आसपास है। यानी लगभग 80 लाख टन यूरिया हर साल विदेशों से मंगाना पड़ता है। यह अंतर सरकार के लिए लगातार सिरदर्द बनता जा रहा है। मौजूदा हालात में रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट और गैस की ऊंची कीमतों ने यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ा दी हैं, जिससे भारत का सब्सिडी बिल अब लगभग दो लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है।

सरकार ने आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में कई कदम उठाए हैं — नई यूरिया फैक्ट्रियों के पुनरुद्धार से लेकर नैनो यूरिया के प्रयोग तक — लेकिन ज़मीन पर इन योजनाओं का असर सीमित ही दिख रहा है। किसानों के लिए खाद की मांग लगातार बढ़ रही है क्योंकि जलवायु परिवर्तन और मिट्टी की घटती उर्वरता ने फसलों को अधिक नाइट्रोजन की ज़रूरतमंद बना दिया है। गेहूं, धान और मक्का जैसी फसलों की बुआई के दौरान यूरिया की खपत में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है।

कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारत में पिछले पाँच सालों में यूरिया की खपत में लगभग 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जबकि घरेलू उत्पादन केवल 8–10 प्रतिशत तक ही बढ़ पाया है। अधिकारी के अनुसार, “किसानों को समय पर खाद मिले, इसके लिए सरकार हर संभव कदम उठा रही है, लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें और बढ़ीं, तो सब्सिडी का बोझ काफी बढ़ जाएगा।”

रिपोर्टों के मुताबिक, भारत में प्रति हेक्टेयर यूरिया उपयोग अब वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रति हेक्टेयर 170 किलोग्राम से अधिक यूरिया का उपयोग हो रहा है, जबकि वैश्विक औसत करीब 130 किलोग्राम है। यह अत्यधिक उपयोग न केवल मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि पर्यावरण और भूजल प्रदूषण की समस्या को भी जन्म दे रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मिट्टी में नाइट्रोजन का असंतुलन दीर्घकाल में भूमि की स्थायी उर्वरता को प्रभावित कर रहा है।

सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए ‘वन नेशन, वन फर्टिलाइज़र’ योजना लागू की है, जिसके तहत पूरे देश में यूरिया को “भारत यूरिया” ब्रांड नाम से बेचा जा रहा है। इसके साथ-साथ नैनो यूरिया को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसे भारतीय किसान उर्वरक सहकारी (IFFCO) ने विकसित किया है। दावा है कि नैनो यूरिया पारंपरिक यूरिया की तुलना में दस गुना प्रभावी है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचाता। हालांकि, छोटे किसानों में अभी भी इसके उपयोग को लेकर संशय बना हुआ है, क्योंकि उन्हें इसके प्रभाव और परिणामों पर भरोसा नहीं हो पा रहा।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यूरिया संकट भारत की कृषि अर्थव्यवस्था और राजकोषीय अनुशासन दोनों पर भारी असर डाल सकता है। इस वर्ष अकेले यूरिया सब्सिडी पर सरकार को लगभग 1.75 लाख करोड़ रुपये का खर्च उठाना पड़ा है — जो रक्षा और शिक्षा मंत्रालय के कुल बजट के बराबर है। यही वजह है कि केंद्र सरकार अब ग्रीन अमोनिया और ग्रीन यूरिया परियोजनाओं पर काम कर रही है, ताकि 2030 तक उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके।

खास तौर पर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे कृषि प्रधान राज्यों में स्थिति और गंभीर है। इन राज्यों में हर फसल सीज़न के दौरान यूरिया की लंबी कतारें और कालाबाज़ारी आम बात बन चुकी है। कई जगहों पर किसान खुदरा विक्रेताओं पर ओवरप्राइसिंग के आरोप लगा रहे हैं, जबकि अधिकारी बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अब भारत को सिर्फ़ “ज्यादा उत्पादन” पर नहीं, बल्कि “स्मार्ट उपयोग” पर ध्यान देना होगा। इसके लिए मिट्टी परीक्षण, डिजिटल फर्टिलाइज़र वितरण, और फसल-आधारित खपत मॉनिटरिंग को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। वे चेतावनी देते हैं कि यदि नीतिगत सुधार समय पर नहीं हुए, तो भविष्य में यूरिया संकट तेल संकट की तरह राष्ट्रीय स्तर का आर्थिक झटका बन सकता है।

अनिल अंबानी पर सरकारी बैंकों का 42 हजार करोड़ रुपये का बोझ, वसूली अब भी अधर में

अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (एडीएजी) की कंपनियों पर सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों का बकाया अब एक आर्थिक अपराध की कहानी बन चुका है। 2020 से लेकर 2025 तक का सफर सिर्फ आंकड़ों और जांचों का नहीं, बल्कि एक ऐसे सिस्टम की कमजोरी का भी प्रतीक है जो बड़े उद्योगपतियों की चूक को सार्वजनिक धन की हानि में बदल देता है। एलआईसी, एसबीआई, बैंक ऑफ बड़ौदा और कैनरा बैंक जैसे दिग्गज पीएसयू संस्थानों के हजारों करोड़ रुपये अब तक फंसे हैं, और सवाल वही है — क्या यह पैसा कभी लौटेगा?

कई बार लोन वेवऑफ हो चुका है

अनिल अंबानी समूह (ADAG) की कंपनियों को लेकर पिछले कुछ वर्षों में लोन माफी और कर्ज पुनर्गठन का खेल बेहद जटिल और विवादास्पद रहा है। 2020 से 2023 के बीच कई सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने करीब 10,000 से 12,000 करोड़ रुपये तक के लोन को “राइट-ऑफ” यानी बट्टे खाते में डाल दिया, जिसमें रिलायंस कम्युनिकेशंस, रिलायंस कैपिटल और रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी कंपनियां शामिल थीं। इनमें से अधिकांश रकम अब तक वसूल नहीं हो सकी है। बैंकों का कहना था कि यह “तकनीकी राइट-ऑफ” है ताकि बैलेंस शीट साफ दिखाई दे, लेकिन असलियत यह है कि जनता का पैसा फिर से जोखिम में चला गया। विशेष रूप से एसबीआई, बैंक ऑफ बड़ौदा और आईडीबीआई बैंक ने बड़े हिस्से को नुकसान मानकर खातों से बाहर कर दिया — जिससे यह सवाल और तेज हुआ कि क्या बड़े उद्योगपतियों के लिए “लोन माफी” एक प्रथा बन चुकी है, जबकि आम आदमी के लिए छोटे कर्ज पर भी वसूली के नोटिस झट से पहुंच जाते हैं।

2020 की तस्वीर: जब जनता का पैसा कॉर्पोरेट कर्ज में फंसा

साल 2020 में जब देश कोविड-19 की मार झेल रहा था, तब एडीएजी साम्राज्य आर्थिक संकट में डूब चुका था। रिपोर्ट्स के मुताबिक एलआईसी का रिलायंस कैपिटल, रिलायंस कम्युनिकेशंस और रिलायंस होम फाइनेंस जैसी कंपनियों में लगभग 7,950 करोड़ रुपये का एक्सपोजर था। वहीं, एसबीआई का आरकॉम पर करीब 3,000 करोड़ रुपये, बैंक ऑफ बड़ौदा का 14,000 करोड़ रुपये तक का बकाया, और कैनरा बैंक का 1,000 करोड़ रुपये से अधिक का जोखिम सामने आया। कुल मिलाकर सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर 90,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का बोझ था — जो आम भारतीय करदाताओं के पसीने की कमाई से बना कोष है।

शादी सीजन से देश की अर्थव्यवस्था में चमक: 6.5 लाख करोड़ का व्यापार, स्वदेशी थीम बनी नई पहचान

भारत में इस बार शादियों का सीजन सिर्फ खुशियों और रस्मों का नहीं, बल्कि एक आर्थिक उत्सव भी बन गया है। देशभर में 1 नवंबर से 14 दिसंबर 2025 के बीच होने वाली 46 लाख से अधिक शादियों से लगभग ₹6.5 लाख करोड़ का व्यापार होने का अनुमान है। यह आंकड़ा देश की रिटेल और सर्विस इंडस्ट्री के लिए एक नया रिकॉर्ड साबित हो सकता है।

दिल्ली अकेले ₹1.8 लाख करोड़ का कारोबार करेगी, जहाँ करीब 4.8 लाख शादियाँ होंगी। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के अनुसार, पिछले साल की तुलना में इस बार शादी पर खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसका कारण है—लोगों की खर्च करने की क्षमता बढ़ना, सोने-चांदी की ऊँची कीमतों के बावजूद उपभोक्ता आत्मविश्वास में इजाफा, और “वोकल फॉर लोकल” की भावना का गहराना।

सीएआईटी की रिपोर्ट बताती है कि 70% से अधिक शादी से जुड़ा व्यापार घरेलू उत्पादों पर निर्भर है। भारतीय ज्वेलरी, कपड़ा, डेकोर और हस्तशिल्प बाजार में अभूतपूर्व मांग दर्ज की गई है। ‘मेड इन इंडिया’ थीम वाले आयोजन और स्वदेशी सजावट का चलन जोरों पर है। शादी के आयोजनों में अब राजस्थानी हस्तकला, कांचीपुरम सिल्क, बनारसी ब्रोकेड, और ब्लॉक प्रिंटेड कपड़े जैसी पारंपरिक कलाएं फिर से प्रचलन में आ गई हैं।

इस बार का शादी सीजन “वोकल फॉर लोकल” और “स्वदेशी” थीम से सराबोर है। जयपुर, उदयपुर, जोधपुर, ऋषिकेश, और गोवा जैसी डेस्टिनेशन वेडिंग लोकेशंस में होटलों की बुकिंग्स कई महीनों पहले से फुल हो चुकी हैं। राजस्थान और हिमाचल के पैलेस रिसॉर्ट्स, कोच्चि और सोलन के वेडिंग हब्स, और कूर्ग जैसे नेचर हॉलिडे स्थलों पर शानदार शादियों की तैयारियां जारी हैं।

आंकड़ों के अनुसार, शादी पर औसत खर्च ₹25 से ₹70 लाख के बीच है। हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) में से लगभग 10-15% लोग विदेशों की बजाय भारत में ही डेस्टिनेशन वेडिंग कराना पसंद कर रहे हैं — जो ‘स्वदेशी शिफ्ट’ का एक मजबूत संकेत है।

सजावट और थीम की बात करें तो ‘देसी वेडिंग डेकोर’ की मांग में 1,825% की वृद्धि दर्ज की गई है। ब्लॉक प्रिंट, जरी, ज़रदोज़ी, पीतल और हस्तनिर्मित वस्त्रों का उपयोग बढ़ा है। स्थानीय कलाकारों और ग्रामीण शिल्पकारों को शादी उद्योग में अभूतपूर्व अवसर मिल रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह शादी सीजन भारत की लोकल इकॉनमी के लिए दिवाली से भी बड़ा मौका है। खानपान, परिधान, ज्वेलरी, ब्यूटी सर्विसेज, ट्रैवल, इवेंट मैनेजमेंट और डेकोरेशन जैसे क्षेत्रों में करोड़ों लोगों को रोज़गार और व्यापार के अवसर मिले हैं।

CAIT के चेयरमैन प्रवीण खंडेलवाल का कहना है — “इस बार का शादी सीजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के पुनरुत्थान का प्रतीक है। ‘वोकल फॉर लोकल’ अब नारा नहीं, एक आंदोलन बन चुका है, जिसने भारतीय बाजार को नई ऊर्जा दी है।”

केंद्र ने QCO सुधारों पर दिखाई तेजी, 200 उत्पादों पर आदेश हटाने की तैयारियों से उद्योग को बड़ी राहत के संकेत

कैबिनेट सचिवालय के हस्तक्षेप के बाद सरकारी विभाग और मंत्रालय गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (क्यूसीओ) में सुधार के लिए सक्रिय हो गए हैं। उन्हें ये सुधार 15 नवंबर यानी कल तक करने हैं।

नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति ने क्यूसीओ को रद्द, निलंबित और स्थगित करने पर रिपोर्ट पेश की थी। सरकारी अधिकारियों ने बताया कि इस मामले में कैबिनेट सचिवालय ने सरकारी विभागों से ‘कार्रवाई’ रिपोर्ट मांगी थी।

समिति ने एक आंतरिक रिपोर्ट में 200 से अधिक उत्पादों के लिए क्यूसीओ को रद्द, निलंबित और स्थगित करने का प्रस्ताव दिया था। इसमें चिंता जताई गई थी कि इन आदेशों ने अनुपालन बोझ बढ़ा दिया है और आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर दिया है। इससे भारत की विनिर्माण प्रतिस्पर्धा को नुकसान हो रहा है। रिपोर्ट में इन 200 उत्पादों में से सरकार को उद्योग पर दबाव कम करने के लिए प्लास्टिक, पॉलिमर, बेस मेटल, फुटवियर और इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों जैसी प्रमुख सामग्री को कवर करने वाले 27 क्यूसीओ को रद्द करने की सिफारिश की गई थी। यह कार्रवाई संबंधित मंत्रालयों को लागू करनी थी। इनमें कपड़ा मंत्रालय, रसायन और उर्वरक विभाग, उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग, इस्पात मंत्रालय, खान मंत्रालय और अन्य विभाग शामिल हैं। क्यूसीओ से जुड़े सुधार ऐसे समय में आए हैं जब भारत और अमेरिका लंबे समय से अटके व्यापार समझौते को लगभग अंतिम रूप दे चुके हैं। अमेरिका ने भारत की क्यूसीओ व्यवस्था पर गैर-शुल्क बाधा के रूप में बार-बार चिंता जताई है जो भारत के बाजार में अमेरिकी निर्यात को बाधा पहुंचाता है। क्यूसीओ सहित गैर-शुल्क बाधाएं भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में चर्चा का प्रमुख बिंदु रही हैं। कैबिनेट सचिवालय को भेजे गए ईमेल सवालों का जवाब नहीं मिला।

निर्यातकों को मिली बड़ी राहत, कैबिनेट ने ₹45,060 करोड़ की दो योजनाओं को दी मंजूरी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने निर्यातकों, खास तौर पर एमएसएमई को सहायता और संरक्षण प्रदान करने के लिए 45,060 करोड़ रुपये की योजनाओं को आज मंजूरी दी। ये निर्यातक अमेरिका द्वारा भारत के कई उत्पादों पर 50 फीसदी शुल्क लगाए जाने के कारण चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इन योजनाओं में 25,060 करोड़ रुपये का बहुप्रतीक्षित निर्यात संवर्धन मिशन (ईपीएम) और निर्यातकों के लिए ऋण गारंटी योजना (सीजीएसई) के विस्तार के लिए 20,000 करोड़ रुपये शामिल हैं।

यह घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ विभिन्न क्षेत्रों के कम से कम आधा दर्जन निर्यात संवर्धन परिषदों के प्रमुखों की बैठक के एक सप्ताह बाद की गई है, जो अमेरिकी शुल्क से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। इसके साथ ही देश में उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण खनिजों पर रॉयल्टी को दुरुस्त बनाने के प्रस्ताव को भी हरी झंडी दी गई।

निर्यात संवर्धन मिशन की घोषणा केंद्रीय बजट में चालू वित्त वर्ष के लिए 2,250 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ की गई थी। अब बढ़े हुए आवंटन के साथ यह वित्त वर्ष 2031 तक जारी रहेगा। इसका उद्देश्य भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता, पहली बार निर्यात करने वाले निर्यातकों और श्रम-प्रधान क्षेत्रों, जैसे वस्त्र, चमड़ा, रत्न एवं आभूषण, इंजीनियरिंग सामान और समुद्री उत्पादों को मजबूत करना है।

25,060 करोड़ रुपये के निर्यात संवर्धन मिशन को दो उप-योजनाओं निर्यात प्रोत्साहन (10,401 करोड़ रुपये) और निर्यात दिशा (14,659 करोड़ रुपये) के माध्यम से क्रियान्वित किया जाएगा। मंत्रिमंडल के ​फैसलों की जानकारी देते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि यह एक व्यापक मिशन है और पूरे निर्यात परिवेश को सहयोग प्रदान करेगा।

इस कदम से घरेलू निर्यातकों को अमेरिकी शुल्क से उत्पन्न वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं से बचाने में मदद मिलेगी। अमेरिका ने 27 अगस्त से भारतीय वस्तुओं के निर्यात पर 50 फीसदी का भारी शुल्क लगा दिया है। ‘निर्यात प्रोत्साहन’ के अंतर्गत ब्याज सहायता, निर्यात फैक्टरिंग, ब्याज गारंटी, ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिए क्रेडिट कार्ड और नए बाजारों में विविधीकरण के लिए ऋण वृद्धि सहायता दी जाएगी।