शिक्षा

“शिक्षा से जुड़ी ताज़ा खबरें, सरकारी योजनाएँ, परीक्षा अपडेट, एडमिशन अलर्ट, छात्रों के करियर से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले, और देश-दुनिया की शिक्षा नीति पर बड़े बदलाव—सबसे पहले और सबसे सटीक।”

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12,000 से ज्यादा पद खाली — केंद्रीय व नवोदय स्कूलों में बड़ी भर्ती

केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) और नवोदय विद्यालय समिति (NVS) ने देशभर के स्कूलों में 12,000 से अधिक शिक्षण और गैर–शिक्षण पदों पर बड़ी भर्ती का ऐलान कर दिया है। वर्षों से लंबित इन रिक्तियों को भरने के लिए केंद्र सरकार ने आधिकारिक रूप से नोटिफिकेशन जारी कर भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी है। आवेदन की प्रक्रिया 14 नवंबर से ऑनलाइन शुरू होगी, जबकि इच्छुक उम्मीदवार निर्धारित अंतिम तिथि से पहले अपने फॉर्म भर सकेंगे।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक KVS में लगभग 7,700 से अधिक पद खाली पड़े हैं, जबकि NVS में करीब 4,300 पदों पर तुरंत भर्ती की आवश्यकता है। इन दोनों संस्थाओं में पढ़ने वाले लाखों छात्रों को लंबे समय से शिक्षक और स्टाफ की कमी का सामना करना पड़ रहा था, जिसे दूर करने के लिए यह भर्ती अभियान बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार यह अब तक की सबसे बड़ी संयुक्त भर्ती प्रक्रियाओं में से एक है।

इन रिक्तियों में PRT (प्राथमिक शिक्षक), TGT (प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक), PGT (पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षक) के साथ–साथ लाइब्रेरियन, क्लर्क, लैब असिस्टेंट, ऑफिस स्टाफ और अन्य गैर–शिक्षण पद भी शामिल हैं। उम्मीदवारों से संबंधित योग्यता, आयु सीमा और चयन प्रक्रिया का विवरण आधिकारिक भर्ती नोटिफिकेशन में उपलब्ध है। भर्ती परीक्षा कंप्यूटर–बेस्ड टेस्ट (CBT), इंटरव्यू और दस्तावेज़ सत्यापन के आधार पर आयोजित की जाएगी।

इच्छुक अभ्यर्थी KVS और NVS की आधिकारिक वेबसाइटों के साथ-साथ शिक्षा मंत्रालय की पोर्टल पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी शिक्षण संस्थानों में नौकरी की स्थिरता, सुविधाएँ और पदों की व्यापक संख्या को देखते हुए यह भर्ती युवाओं के लिए एक बड़ा अवसर है। साथ ही, इन रिक्तियों के भरने से देशभर के केंद्रीय और नवोदय विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों में महत्वपूर्ण सुधार आएगा।

ऑस्ट्रेलिया का बड़ा फैसला नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया बंद

ऑस्ट्रेलिया सरकार ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला लेते हुए यह घोषणा कर दी है कि 16 वर्ष से कम उम्र का कोई भी बच्चा अब देश में फेसबुक इंस्टाग्राम टिकटॉक स्नैपचैट यूट्यूब एक्स (पूर्व ट्विटर) रेडिट या किक जैसे किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग नहीं कर सकेगा। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ ने इस फैसले को बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके समग्र विकास की सुरक्षा के लिए समय की सबसे बड़ी ज़रूरत बताते हुए घोषणा की कि यह नियम 10 दिसंबर 2025 से पूरे देश में लागू हो जाएगा। इसका मतलब है कि 16 साल से कम उम्र के नाबालिग न तो नया अकाउंट बना सकेंगे न मौजूदा अकाउंट चला सकेंगे और प्लेटफॉर्म कंपनियों पर यह कानूनी जिम्मेदारी होगी कि वे किसी भी हाल में नाबालिग को प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँचने न दें।

सरकार के अनुसार इस कानून का उद्देश्य बच्चों को सोशल मीडिया पर मौजूद हानिकारक सामग्री साइबर बुलिंग अश्लील सामग्री हिंसक वीडियो हेट कंटेंट और गलत जानकारी के जाल से बचाना है। प्रधानमंत्री अल्बनीज़ ने कहा कि दुनिया भर के कई प्रमुख अध्ययनों में स्पष्ट रूप से पाया गया है कि सोशल मीडिया का लंबे समय तक उपयोग बच्चों की मानसिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डालता है—उनमें चिंता बढ़ती है, अवसाद उभरता है, नींद की कमी होती है और एकाग्रता लगातार घटती जाती है। इसी कारण सरकार अब किसी भी प्रकार की ढिलाई बरतने को तैयार नहीं है। संचार मंत्री मिशेल राउस ने भी दोहराया कि डिजिटल दुनिया बच्चों को नुकसान पहुँचाने की जगह नहीं हो सकत सरकार का पहला कर्तव्य उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

इस कानून में सबसे चुनौतीपूर्ण प्रश्न यह था कि आयु सत्यापन कैसे किया जाएगा क्योंकि दुनिया भर में सोशल मीडिया कंपनियों को नाबालिगों की सही उम्र का पता लगाना मुश्किल होता है। लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने इस मुद्दे पर दुनिया के लिए एक नया मॉडल प्रस्तुत किया है। नए नियमों के अनुसार सोशल मीडिया कंपनियों को कई स्तरीय आयु सत्यापन तकनीकों का उपयोग करना होगा। इसमें शामिल हो सकता है सरकारी आईडी या किसी आधिकारिक दस्तावेज का प्रस्तुतिकरण चेहरे की पहचान तकनीक के जरिए उम्र का अनुमान लगाना आवाज विश्लेषण और यहां तक कि उपयोगकर्ता के टाइपिंग पैटर्न शब्द चयन ब्राउज़िंग शैली और कनेक्शन डेटा के आधार पर अनुमान तैयार करना। संचार मंत्री अनिका वेल्स ने कहा कि हालाँकि ये सभी तकनीकें 100 प्रतिशत सटीक नहीं होंगी लेकिन कानून तोड़ने का कोई बहाना नहीं चलेगा। यदि कंपनियां इन उपायों को लागू नहीं करतीं तो उन्हें भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई झेलनी पड़ेगी।

राहुल के नालंदा सपने पर झूठा ज्ञान बेच रहे थे “दो वोट वाले” राकेश सिन्हा, मुकेश कुमार ने इतिहास पढ़ा डाला

बिहार की धरती पर जब राहुल गांधी ने जनता के बीच खड़े होकर यह कहा कि — “मेरा वादा है, बिहार में दुनिया की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटी बनेगी… नालंदा जैसा गौरव फिर से लौटेगा…” — तो भीड़ में जोश था, तालियां थीं और एक उम्मीद की लौ थी कि शायद कोई तो नेता है जो बिहार को सिर्फ जाति और वोट के तराजू से नहीं, ज्ञान और गौरव के प्रतीक के रूप में देखना चाहता है। राहुल ने जिस “नए नालंदा” का सपना बोला, उसमें शिक्षा की शक्ति थी, और इतिहास से सीखने की प्रेरणा भी।

लेकिन जैसे ही यह बात देशभर में गूंजी, वहीं से निकले “फर्जी ज्ञान के ठेकेदार” — राकेश सिन्हा, जो दो-दो जगह से वोट डालने वाले ‘ज्ञानी प्रोफेसर’ के नाम से कुख्यात हो चुके हैं। उन्होंने तुरंत शोर मचा दिया — “हिम्मत नहीं है राहुल गांधी की कि बख्तियार खिलजी का नाम लें, जिसने नालंदा जलाया!” और फिर वही पुरानी रट — “उन्हें इतिहास की तारीख तक नहीं पता।”

यानी जिनकी अपनी राजनीतिक जीवन की डिग्री फर्जी और दोहरे वोट की स्याही से दागदार है, वे देश को इतिहास सिखाने निकले हैं! लेकिन इस बार मैदान में उतरे वरिष्ठ पत्रकार डॉ. मुकेश कुमार, जिन्होंने अपने तथ्य और तर्क से सिन्हा के उस “नकली ज्ञान” को चीर कर रख दिया।

मुकेश कुमार ने करारा जवाब दिया — “काहे के प्रोफेसर हो राकेश सिन्हा? इतना भी नहीं जानते कि बख्तियार खिलजी तो बिहार गया ही नहीं था!” उन्होंने इतिहास के पन्नों से सटीक तथ्य रखे — “नालंदा विश्वविद्यालय को किसी मुस्लिम आक्रांता ने नहीं जलाया था। उसे नष्ट किया था उन ब्राह्मणों ने जिन्हें बौद्ध धर्म के विस्तार से खतरा महसूस हो रहा था।”

यह बयान सिर्फ एक जवाब नहीं था — यह उस छिपाए गए इतिहास का उद्घाटन था जिसे सदियों से धार्मिक प्रोपेगेंडा और झूठे गौरवगान की परतों के नीचे दबा दिया गया। मुकेश कुमार ने आगे कहा — “ब्राह्मणवादी शक्तियों ने सिर्फ नालंदा ही नहीं, हजारों बौद्ध विहारों को जलाया, मठों को नष्ट किया और लाखों बौद्ध भिक्षुओं का नरसंहार किया। यह इतिहास है, टीवी डिबेट का ज्ञान नहीं।”

इतिहासकारों का भी कहना है कि 12वीं शताब्दी में नालंदा का पतन बख्तियार खिलजी के कारण नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक टकराव और उस समय की ब्राह्मणिक प्रतिशोध भावना के चलते हुआ था। बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव से डरी कट्टर शक्तियों ने मठों और विश्वविद्यालयों को ध्वस्त किया ताकि “ज्ञान पर एकाधिकार” फिर से उनके हाथ में लौट आए। यह वही दौर था जब बौद्ध धर्म को भारत से लगभग मिटा दिया गया और उसकी जगह धर्म के नाम पर पाखंड और पदानुक्रम का राज स्थापित किया गया।

देश में मेडिकल शिक्षा का विस्तार: अनुप्रिया

निश्चय टाइम्स, डेस्क। नई दिल्ली। देश में चिकित्सा शिक्षा को लेकर एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। सरकार द्वारा मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा पाठ्यक्रमों में सीटों की संख्या में ऐतिहासिक वृद्धि की गई है। वर्ष 2014 से अब तक मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 से बढ़कर 780, स्नातक (UG) सीटें 51,348 से बढ़कर 1,15,900, और स्नातकोत्तर (PG) सीटें 31,185 से बढ़कर 74,306 हो गई हैं।
यह जानकारी केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर के माध्यम से दी। उन्होंने कहा कि सरकार चिकित्सा शिक्षा को व्यापक और सुलभ बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, देश में इस समय 13,86,157 पंजीकृत एलोपैथिक डॉक्टर हैं। वहीं आयुष मंत्रालय के अनुसार, आयुष चिकित्सा पद्धति में 7,51,768 पंजीकृत चिकित्सक कार्यरत हैं। यदि दोनों प्रणालियों में पंजीकृत चिकित्सकों की 80 प्रतिशत उपस्थिति को आधार माना जाए, तो देश में डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात 1:811 होने का अनुमान है, जो स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।

मिनिमम स्टैंडर्ड रेगुलेशन -2023 लागू
सरकार ने चिकित्सा क्षेत्र में गुणवत्ता, पहुंच और समानता सुनिश्चित करने के लिए एमएसआर-2023 (मिनिमम स्टैंडर्ड रेगुलेशन) जैसे नियम लागू किए हैं, जो नए मेडिकल संस्थानों की स्थापना, नए पाठ्यक्रमों की शुरुआत, और बुनियादी ढांचे की न्यूनतम आवश्यकताओं को निर्धारित करते हैं।
सरकार की प्राथमिकता वंचित क्षेत्रों और आकांक्षी जिलों में चिकित्सा संस्थानों की स्थापना पर है। इसके लिए कई योजनाएं क्रियान्वित की जा रही हैं:
जिला/रेफरल अस्पतालों के आधुनिकीकरण के माध्यम से 157 स्वीकृत मेडिकल कॉलेजों में से अब तक 131 कॉलेजों में शैक्षणिक कार्य शुरू हो चुका है।
एमबीबीएस और पीजी सीटों को बढ़ाने के लिए मौजूदा मेडिकल कॉलेजों को आधुनिक उपकरणों और सुविधाओं से लैस किया जा रहा है। प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत 75 सुपर स्पेशियलिटी परियोजनाएं स्वीकृत की गईं, जिनमें से 71 परियोजनाएं पूर्ण हो चुकी हैं।

“शिक्षा से जुड़ी ताज़ा खबरें, सरकारी योजनाएँ, परीक्षा अपडेट, एडमिशन अलर्ट, छात्रों के करियर से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले, और देश-दुनिया की शिक्षा नीति पर बड़े बदलाव—सबसे पहले और सबसे सटीक।”

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नेशनल एजुकेशन डे: कांग्रेस बोली—भारत की हर कक्षा में गूंजती है मौलाना आज़ाद की विरासत

नेशनल एजुकेशन डे के मौके पर कांग्रेस ने देश के पहले शिक्षा मंत्री और महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को याद करते हुए कहा कि भारत की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की नींव जिस दूरदृष्टि और वैचारिक मजबूती पर खड़ी है, वह मौलाना आज़ाद की देन है। कांग्रेस ने कहा कि आज का दिन सिर्फ एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा को सशक्त और समावेशी बनाने की उनकी प्रतिबद्धता का सम्मान करने का दिन है।

कांग्रेस ने अपने संदेश में कहा कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एक सच्चे विज़नरी थे—एक ऐसे नेता, जिन्होंने आज़ादी के तुरंत बाद हिंदुस्तान के भविष्य को संवारने के लिए शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का केंद्रबिंदु बनाया। उन्होंने वैज्ञानिक सोच, सामाजिक समरसता और आधुनिक शिक्षण संस्थानों की स्थापना को बढ़ावा दिया। कांग्रेस ने कहा कि भारत की कई प्रतिष्ठित संस्थाओं की नींव में मौलाना आज़ाद का योगदान अमिट रूप से दर्ज है।

पार्टी ने कहा कि मौलाना आज़ाद की विरासत आज भी देशभर के शिक्षकों, प्रोफेसरों और शिक्षाविदों के माध्यम से जीवित है, जो लाखों विद्यार्थियों के जीवन को प्रकाशित करते हुए राष्ट्र को मजबूत बना रहे हैं। कांग्रेस ने कहा कि शिक्षा केवल ज्ञान का प्रसार नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने की शक्ति है—और यही दर्शन मौलाना आज़ाद ने भारत को दिया।

कांग्रेस ने अंत में कहा कि नेशनल एजुकेशन डे हमें यह याद दिलाता है कि मजबूत, प्रगतिशील और समावेशी भारत की नींव शिक्षा से ही गुज़रती है—और मौलाना आज़ाद इस नींव के सबसे ऊंचे स्तंभों में से एक हैं।

यूपी के सभी स्कूलों में वंदे मातरम् अनिवार्य — योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण और व्यापक बदलाव की घोषणा करते हुए कहा है कि अब सभी सरकारी, निजी, सहायता-प्राप्त स्कूलों, कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा और स्वतंत्रता संग्राम का वैचारिक प्रतीक है, और इसका नियमित गायन छात्रों में देशभक्ति, अनुशासन, मातृभूमि के प्रति सम्मान और राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करेगा। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि इस आदेश का पालन हर संस्थान में सुनिश्चित किया जाए और इसे दैनिक प्रार्थना-सत्र तथा शैक्षणिक दिनचर्या का स्थायी हिस्सा बनाया जाए। सरकार का मानना है कि सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने और बच्चों में नागरिक चेतना पैदा करने के लिए यह कदम अत्यंत आवश्यक है।

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि देश किसी धर्म, जाति या पंथ से ऊपर है, और किसी को भी “विभाजनकारी विचारधारा” फैलाकर समाज में नफरत पैदा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने अपनी टिप्पणी में कहा कि इस प्रकार की सोच “नए जिन्ना” पैदा करती है और इसे रोकना आवश्यक है। उनकी यह टिप्पणी शिक्षा नीति और राजनीतिक विमर्श दोनों में गूंज पैदा कर रही है, क्योंकि यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं बल्कि संस्कृति, राष्ट्रवाद और शिक्षा के संगम पर लिया गया निर्णय है। मुख्यमंत्री ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि छात्रों को ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ, इतिहास और साहित्यिक महत्व भी समझाया जाए ताकि यह मात्र औपचारिकता न रहकर एक संवेदनशील, भावनात्मक और वैचारिक अभ्यास बन सके।

इस आदेश के लागू होने के बाद स्कूलों में प्रार्थना-सभा की संरचना में बदलाव आएगा, शिक्षकों पर नई जिम्मेदारियाँ बढ़ेंगी और शिक्षा विभाग को निगरानी के नए मानक बनाने होंगे। जबकि कई विशेषज्ञ इसे छात्रों में राष्ट्र-चेतना जगाने की दिशा में सकारात्मक कदम बताते हैं, कुछ शिक्षाविद विविध पृष्ठभूमियों वाले छात्रों की संवेदनाओं को संतुलित करने की आवश्यकता की ओर भी संकेत करते हैं। फिर भी सरकार का रुख साफ है—वंदे मातरम् को राष्ट्र गौरव का प्रतीक मानते हुए इसे विवाद रहित सर्वमान्य और सर्व-समावेशी बनाया जाए।

नेपाल देख लें… पोर्न बैन नाकाफी: सुप्रीम कोर्ट

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नाबालिग किशोरों को पोर्न साइट्स की पहुँच से रोकने संबंधी एक अहम याचिका पर सुनवाई चार हफ्ते के लिए टाल दी है, लेकिन इसके साथ ही अदालत ने इस मुद्दे पर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की — “सिर्फ प्रतिबंध लगाना समाधान नहीं हो सकता।” अदालत ने नेपाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ पोर्न को बैन करने के बावजूद न तो समस्या खत्म हुई और न ही बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हो पाई, बल्कि प्रतिबंधों को चकमा देने के नए रास्ते खुल गए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डिजिटल युग में किसी सामग्री को ब्लॉक कर देना एक तकनीकी उपाय तो है, लेकिन समस्या कहीं अधिक गहरी और जटिल है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आज की पीढ़ी इंटरनेट पर अधिक समय बिता रही है, इसलिए पोर्नोग्राफिक सामग्री तक पहुँच रोकना सिर्फ तकनीकी बंदिशों से संभव नहीं। VPN, मिरर साइट्स और सोशल प्लेटफार्मों के माध्यम से किशोर आसानी से प्रतिबंधों के दायरे को पार कर जाते हैं। ऐसे में यदि माता-पिता, स्कूल और समाज अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हट जाएँ और सबकुछ कानून या प्लेटफॉर्म के भरोसे छोड़ दिया जाए — तो यह सीधे-सीधे युवाओं के मानसिक-स्वास्थ्य और व्यवहार को खतरे में डालने जैसा होगा।

अदालत ने सरकार और नीति-निर्माताओं को संकेत दिया कि समग्र नीति की आवश्यकता है — जिसमें Digital Parenting, Internet Safety Education, Healthy Sexual Awareness, Psychological Support और Social Monitoring जैसे तत्व शामिल हों। कोर्ट ने कहा कि नई पीढ़ी को जागरूक बनाना सबसे ज़रूरी है, क्योंकि जिज्ञासा को दबाने से नहीं, सही जानकारी और समझ देने से समाधान निकलता है।

इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का रुख यह दर्शाता है कि बच्चों की सुरक्षा सिर्फ प्रतिबंधित दीवारें खड़ी कर देने भर से नहीं होगी, बल्कि एक ऐसे माहौल के निर्माण से होगी जहाँ किशोर जोखिमों को पहचानें और तकनीक का स्मार्ट व सुरक्षित उपयोग करना सीखें। अदालत ने साफ कहा — तकनीकी युग के जोखिमों से लड़ने के लिए समाज, सरकार, परिवार और स्कूल — सभी को मिलकर आगे आना होगा।

कमिश्नर ने लिया प्राइमरी स्कूलों का जायजा

लखनऊ। स्मार्ट सिटी योजना के अंतर्गत प्राथमिक विद्यालयों के विकास कार्यों की प्रगति और गुणवत्ता की जांच हेतु मंडलायुक्त डॉ. रोशन जैकब ने आज विभिन्न स्कूलों का औचक निरीक्षण किया। इस निरीक्षण के दौरान उन्होंने सबसे पहले प्राथमिक विद्यालय कमता प्रथम का जायजा लिया, जहां स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के अंतर्गत यूपी राजकीय निर्माण निगम एवं रूरल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट द्वारा कराए गए कार्यों की समीक्षा की गई।
अधिकारियों ने जानकारी दी कि विद्यालय में फर्नीचर, टाइल्स, किचन शेड, शौचालय, बाउंड्री वॉल, प्लास्टर, पेंटिंग और इंटरलॉकिंग जैसे निर्माण कार्य पूरे किए गए हैं। निरीक्षण के दौरान डॉ. जैकब ने पाया कि विद्यालय की रैम्प की ऊंचाई अनावश्यक रूप से अधिक है, जिससे बच्चों को असुविधा हो सकती है। इस पर उन्होंने तत्काल रैम्प की ऊंचाई को कम कर उसे छात्रों के अनुकूल बनाने के निर्देश दिए।
इसके बाद उन्होंने चिनहट-1 और चिनहट-2 प्राथमिक विद्यालयों का भी निरीक्षण किया। चिनहट-1 विद्यालय के बाहर कूड़े का ढेर देख उन्होंने गहरी नाराजगी व्यक्त की और मौके पर मौजूद अधिकारियों को फटकार लगाई। उन्होंने जोनल सैनिटेशन ऑफिसर (ZSO) पंकज शुक्ला के खिलाफ तत्काल आरोप पत्र जारी करने के निर्देश भी दिए। डॉ. जैकब ने कहा कि शिक्षा के साथ-साथ स्वच्छता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।